अंजामे-इश्क ये हुआ, हम-तुम हैं जुदा-जुदा

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अंजामे-इश्क ये हुआ, हम-तुम हैं जुदा-जुदा
हम भी खो गए दर्द में, तुम भी हो गए गुमशुदा

चार दिन का वस्ल था, हिज्र के हैं सौ बरस
जी रहे हैं किसी तरह, करके हम खुदा-खुदा

इश्क की इस आग में सब कुछ मेरा जल गया
सांसों में बहते धुएं से जिंदगी भर दम घुटा

दर्द के कातिल हाथों में टूटे सपनों का खंजर
रात के काले साये में रूह जख्मी हो चुका

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