चाँद भी छिप जाता है उसकेमुस्कुराने सेदिन भी ढल जाता है उसके उदास होजाने सेक्यूँ वो नही समझ पाते हैं हाल-ए-दिल मेराके जीना छोड़ देते

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सब्र करना सीखा है मैने , इश्क-ए-मुहाब्बत मे……!!! अब जाकर शामिल हुआ है , ये सिलसिला अपनी आदत मे……!!! हिज्र की राते बहुत काटी है

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इत्तेफ़ाक़ से सही मुलाकातहो गयी,ढूँढ रहे थे जिन्हे उन से बातहो गयी,देखते ही उन को जाने कहा खोगया मै,वही से दोस्तो “‪‎प्यार‬” की शुरूवातहो गयी…

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